बेटा, यहां आना कोई मजबूरी नहीं… ये तो नागदेव का बुलावा है… करीब 70-75 साल के उस बुजुर्ग की सांसें तेज चल रही थीं। एक हाथ बेटे के कंधे पर था, दूसरा लाठी पर। सामने फिसलन भरी चढ़ाई थी, नीचे सैकड़ों फीट गहरी ढलान। फिर भी उनके चेहरे पर थकान से ज्यादा सुकून था। हम नागद्वारी यात्रा के पहले पड़ाव भजियागिरी की ओर बढ़ रहे थे। कुछ ही देर पहले पचमढ़ी से 11 किलोमीटर दूर धूपगढ़ (नागमणी द्वार) से पैदल यात्रा शुरू की थी। सामने था करीब 16 किलोमीटर का वह रास्ता…
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