राजनीति क्या है? वो हर परिस्थिति में निराश न होने वाली दिलेरी भी है! नफ़रत को मणि समझकर अपने मस्तिष्क में सँभाले रखने वाली दिलेरी भी है! … और सपनों को ताश के पत्तों की भाँति मिलाकर और बाँटकर कोई खेल खेलने वाली दिलेरी भी! जिसमें कोई भी हार शाश्वत नहीं होती और कोई भी जीत स्थाई नहीं होती…क्योंकि पत्ते फिर से मिलाए या फेटे जा सकते हैं और जीत की आस फिर से बांधी जा सकती है…
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भास्कर ओपिनियन:इस्तीफ़े के जरिए अमरता चाहने की आतिशी कवायद!
