चुनाव चल रहे हैं। हुंकारें भरी जा रही हैं। दहाड़ें सुनाई दे रही हैं। यहाँ- वहाँ। इधर- उधर। तमाम राजनीतिक दलों और उनके सारे नेताओं को सिर्फ़ अपनी पड़ी है। अपनी सीट की। अपनी सत्ता की। अपनी सरकार की। हम क्यों उदास हैं? हमारा उत्साह कहाँ चला गया…
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भास्कर ओपिनियन:नामांकन पत्र दाखिल करने से उसे वापस लेने तक के दांव
