धरम रहसी-रहसी धरा, खप जासी खुरसाण। अमर विसम्बर ऊपरे, राख नहच्चो राण।।” इस दोहे का अर्थ है- ‘धर्म और धरती हमेशा बने रहेंगे, लेकिन ये विदेशी आक्रमणकारी (खुरसाण) एक दिन समाप्त हो जाएंगे।’ ये दोहा मुगल सेनापति रहीम खान-ए-खाना (मिर्जा खां) ने मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के लिए लिखा था। कारण था- हल्दीघाटी युद्ध के दौरान प्रताप ने मुगलों की बंदी महिलाओं को सम्मान के साथ वापस भेजा था। ऊंच-नीच और भेदभाव से परे प्रताप को भील समुदाय के लोग ‘कीका’ कहकर पुकारते थे। प्रताप की योग्यता के कारण ही उनके पिता महाराणा उदयसिंह द्वितीय के फैसले को बदलकर उन्हें राजगद्दी पर बैठाया गया था। राजा बनने के बाद भी वे अपने साथियों के साथ जमीन पर बैठकर भोजन करते थे। अपने सहयोगी राजाओं की मदद करने में भी पीछे नहीं थे। प्रताप के प्रति वफादारी का आलम ये था कि अकबर की लाख कोशिशों के बाद भी मुगल उनके हाथी को भी नहीं झुका पाए थे। दरअसल…
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महाराणा प्रताप ने नहीं खायी थी घास की रोटी:अकबर ने ले लिया पसंदीदा हाथी ‘रामप्रसाद’; पढ़िए
