बचपन में कोई अतिथि या गुरुजन हमारे घर आते तो बातों-बातों में पूछते, ‘बोलो तो बेटी, पिताजी ज्यादा अच्छे हैं या मां?’ मैं एक बार पिताजी की ओर देखती, एक बार मां की ओर। फिर झट से बोल देती, ‘मां ज्यादा अच्छी है।’ मां ज्यादा अच्छी है कहने का मतलब यह नहीं है कि पिताजी अच्छे नहीं हैं। अपनी नन्हीं-सी बुद्धि से मैंने सिर्फ इतना समझा था कि दुनिया में मां का स्थान कोई नहीं ले सकता। बड़ी होकर मेरी गृहस्थी बसी…
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